कल यानि 31 मार्च को दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र-नेता चंद्रशेखर की हत्या पर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आयोजित प्रोटेस्ट में शामिल हुआ. अपने चार-पांच दोस्तों के साथ निकल पड़ा प्रोटेस्ट के लिए. प्रोटेस्ट शाम 3 बजे से आयोजित था, निकले हम 2 बजे मुनिरका से. मेट्रो से उतरते ही मैंने सबको तेज कदम बढ़ाने कहा क्योंकि 3 बजने को थे. इसपर एक कॉमरेड मित्र फूट पड़े,”अरे यार कार्यक्रमों में टाइम से थोड़े ही कोई आता है, काहे हड़बड़ा रहे हो .” खैर हम टाइम पर पहूंच गए. कुछ-एक अच्छे पत्रकारों, अपने अध्यापकों को पहूंचा देख लगा. धीरे-धीरे और कई पत्रकार, लेखक, कवि, बुद्धिजीवी भी आ गए. अच्छा लग रहा था सबको देख कर. बगल में कोई संस्था नारी बचाओ कार्यक्रम कर रही थी. वहां बच्चे-बच्चियों से नारे लगवाए जा रहे थे- “पुरुषों की भागीदारी हो, सुरक्षित नारी हो.” मुझे एक बात समझ नहीं आती कि नारियों की सुरक्षा पुरुषों की मोहताज क्यों है ? पुरुषों के रहमोकरम से कब निकलेंगी ये. खैर इधर चंदू के कार्यक्रम में अस्मिता ग्रुप ने गीत गाना शुरु किया और रुंधे गले से चंदू को याद करते हुए मर्सिया पढ़ा. जेएनयू के छात्र-छात्राएं भी नारे लगाते हुए पहूंच गए. नारे गूंज रहे थे- “चंदू तुम जिंदा हो, खेतों में खलिहानों में, छात्रों के अरमानों में.” लेकिन एक बात मुझे चुभी, जेएनयू के छात्र-संघ की रैलियों में जहां आइसा हजार-दो हजार स्टूडेंट जुटा लेती है वहीं इस प्रोटेस्ट में स्टूडेंट की संख्या सो-देढ़ सौ थी. फिर मुझे अभी हाल ही में जेएनयू में एडमिशन लिए दोस्त की बात याद आई. उसने एक बार कहा था- “अरे भाई, आइसा वाले हमेशा प्रोटेस्ट जैसे कार्यक्रम करते रहते हैं. मेरे सब सीनियर आइसा में ही हैं, सो सबकी बात रखने के कारण जाना पड़ता है.” मुद्दा यहीं है कि आप भले ही जेएनयू में जीत रहे हों, भीड़ जुटा लें मगर वैचारिकी को लेकर आप कितना जागरुक कर पाते हैं. सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों को लेकर कोई आपके साथ शामिल होता है तो इसका मतलब क्या है? चंद्रशेखर का सपना ऐसा तो नहीं ही रहा होगा.
अब हम जैसे एकदम नए लोग इन चीजों को किस तरह देखें. यह सवाल सिर्फ चंदू का या चंदू के कार्यक्रम का नहीं है. इस जैसे तमाम कार्यक्रमों, प्रोटेस्ट, आंदोलनों का है. क्या मर्सिया पढ़ लिया या उत्सव मना लिया और हो गया हमारा काम पूरा. चंद्रशेखर या फिर कोई भी ऐसा शख्स जो समाज को सुंदर बनाने की कोशिश में कुर्बान होता है, उसका सपना ये नहीं होता कि उसके लिए मर्सिया हो या उत्सव हो. उनका सपना समाज की लड़ाई को जारी रखना होता है. और हम जैसे नए लोगों को इसी तरफ देखना चाहिए. हमारे आदर्श यहीं लोग हो सकते हैं जो कुर्बान हो चुके हैं और लगातार हो रहे हैं. सिर्फ भगत सिंह या चंदू जैसे लोग ही नहीं बल्कि वो सारे लोग जो गुमनाम लड़ते हुए मारे गए. ऐसे कार्यक्रमों की सफलता भी इसी में हैं वरना इनका कोई मतलब नहीं. हमारी प्रतिबद्धता सिर्फ ऐसे कार्यक्रमों से नहीं बल्कि विचारों और प्रतिरोध से जाहिर होनी चाहिए.
-सरोज
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